Tuesday, February 4, 2014

सोलह कलाएं

16 kalas(Shodash kala)१६ कला का ज्ञान..

1. वाक् सिद्धि : जो भी वचन बोले जाए वे व्यवहार में पूर्ण हो, वह वचन कभी व्यर्थ न जाये, प्रत्येक शब्द का महत्वपूर्ण अर्थ हो, वाक् सिद्धि युक्त व्यक्ति में श्राप अरु वरदान देने की क्षमता होती हैं!

2. दिव्य दृष्टि: दिव्यदृष्टि का तात्पर्य हैं कि जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में भी चिन्तन किया जाये, उसका भूत, भविष्य और वर्तमान एकदम सामने आ जाये, आगे क्या कार्य करना हैं, कौन सी घटनाएं घटित होने वाली हैं, इसका ज्ञान होने पर व्यक्ति दिव्यदृष्टियुक्त महापुरुष बन जाता हैं!

3. प्रज्ञा सिद्धि : प्रज्ञा का तात्पर्य यह हें की मेधा अर्थात स्मरणशक्ति, बुद्धि, ज्ञान इत्यादि! ज्ञान के सम्बंधित सारे विषयों को जो अपनी बुद्धि में समेट लेता हें वह प्रज्ञावान कहलाता हें! जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से सम्बंधित ज्ञान के साथ-साथ भीतर एक चेतनापुंज जाग्रत रहता हें!

4. दूरश्रवण : इसका तात्पर्य यह हैं की भूतकाल में घटित कोई भी घटना, वार्तालाप को पुनः सुनने की क्षमता!

5. जलगमन : यह सिद्धि निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं, इस सिद्धि को प्राप्त योगी जल, नदी, समुद्र पर इस तरह विचरण करता हैं मानों धरती पर गमन कर रहा हो!

6. वायुगमन : इसका तात्पर्य हैं अपने शरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर एक लोक से दूसरे लोक में गमन कर सकता हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान पर सहज तत्काल जा सकता हैं!

7. अदृश्यकरण : अपने स्थूलशरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर अपने आप को अदृश्य कर देना! जिससे स्वयं की इच्छा बिना दूसरा उसे देख ही नहीं पाता हैं!

8. विषोका : इसका तात्पर्य हैं कि अनेक रूपों में अपने आपको परिवर्तित कर लेना! एक स्थान पर अलग रूप हैं, दूसरे स्थान पर अलग रूप हैं!

9. देवक्रियानुदर्शन : इस क्रिया का पूर्ण ज्ञान होने पर विभिन्न देवताओं का साहचर्य प्राप्त कर सकता हैं! उन्हें पूर्ण रूप से अनुकूल बनाकर उचित सहयोग लिया जा सकता हैं!

10. कायाकल्प : कायाकल्प का तात्पर्य हैं शरीर परिवर्तन! समय के प्रभाव से देह जर्जर हो जाती हैं, लेकिन कायाकल्प कला से युक्त व्यक्ति सदैव तोग्मुक्त और यौवनवान ही बना रहता हैं!

11. सम्मोहन : सम्मोहन का तात्पर्य हैं कि सभी को अपने अनुकूल बनाने की क्रिया! इस कला को पूर्ण व्यक्ति मनुष्य तो क्या, पशु-पक्षी, प्रकृति को भी अपने अनुकूल बना लेता हैं!

12. गुरुत्व : गुरुत्व का तात्पर्य हैं गरिमावान! जिस व्यक्ति में गरिमा होती हैं, ज्ञान का भंडार होता हैं, और देने की क्षमता होती हैं, उसे गुरु कहा जाता हैं! और भगवन कृष्ण को तो जगद्गुरु कहा गया हैं!

13. पूर्ण पुरुषत्व : इसका तात्पर्य हैं अद्वितीय पराक्रम और निडर, एवं बलवान होना! श्रीकृष्ण में यह गुण बाल्यकाल से ही विद्यमान था! जिस के कारन से उन्होंने ब्रजभूमि में राक्षसों का संहार किया! तदनंतर कंस का संहार करते हुए पुरे जीवन शत्रुओं का संहार कर आर्यभूमि में पुनः धर्म की स्थापना की!

14. सर्वगुण संपन्न : जितने भी संसार में उदात्त गुण होते हैं, सभी कुछ उस व्यक्ति में समाहित होते हैं, जैसे – दया, दृढ़ता, प्रखरता, ओज, बल, तेजस्विता, इत्यादि! इन्हीं गुणों के कारण वह सारे विश्व में श्रेष्ठतम व अद्वितीय मन जाता हैं, और इसी प्रकार यह विशिष्ट कार्य करके संसार में लोकहित एवं जनकल्याण करता हैं!

15. इच्छा मृत्यु : इन कलाओं से पूर्ण व्यक्ति कालजयी होता हैं, काल का उस पर किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं रहता, वह जब चाहे अपने शरीर का त्याग कर नया शरीर धारण कर सकता हैं!

16. अनुर्मि : अनुर्मि का अर्थ हैं-जिस पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी और भावना-दुर्भावना का कोई प्रभाव न हो!

यह समस्त संसार द्वंद्व धर्मों से आपूरित हैं, जितने भी यहाँ प्राणी हैं, वे सभी इन द्वंद्व धर्मों के वशीभूत हैं, किन्तु इस कला से पूर्ण व्यक्ति प्रकृति के इन बंधनों से ऊपर उठा हुआ होता हैं!

ये कला सभी मनुष्य में पाई जाती है पर उस ज्ञान मनुष्य को नहीं होता ,
ऐसे मैं ये अज्ञानता वश वो आपने आप को हर जगह असहाय पता है। .
१६ कला का ज्ञान आप को भी हो सकता है। . पर आब इसे अरबो की आबादी मैं गुरु १ या २ ही मिलेगे जो ऐसा ज्ञान आपने शिष्यों को प्रदान कर पते है

ये ज्ञान खुद आपने आप पाया नहीं जा सकता है। . क्योंकी मनुष्य ने आपने आप को बहुत छोटा बना लिया और चाह की कमी हो जाती है तो और मुस्किल भरा हो जाता है। .

ये ज्ञान गुरु पादुका पूजन से आ सकता है जब आप अपने गुरु को पहचान सके
एकाकार होने की भावना हो समर्पण की भावना हो। शिष्य बनने की भावना हो

परमपूज्य गुरुदेव निखिलेश्वरानंद

Saturday, May 30, 2009

मेरा सपना

किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा कोई जहाँ मेरे लिए मोती भरी सीपियाँ चुनता होगा वो किसी और दुनिया का किनारा होगा काम मुश्किल है मगर जीत ही लूगाँ किसी दिल को मेरे खुदा का अगर ज़रा भी सहारा होगा किसी के होने पर मेरी साँसे चलेगीं कोई तो होगा जिसके बिना ना मेरा गुज़ारा होगा देखो ये अचानक ऊजाला हो चला, दिल कहता है कि शायद किसी ने धीमे से मेरा नाम पुकारा होगा और यहाँ देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया, शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है, किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम ग़र ये खेल ही दोबारा होगा.........!!!

Friday, May 22, 2009

जिन्दगी ये किस मोड पे ले आयी

ziन्दगी ये किस मोड पे ले आयी है,
ना मा, बाप, बहन, ना यहा कोई भाई है.
हर लडकी का है Boy Friend, हर लडके ने Girl Friend पायी है,
चंद दिनो के है ये रिश्ते, फिर वही रुसवायी है.

घर जाना Home Sickness कहलाता है,
पर Girl Friend से मिलने को टाईम रोज मिल जाता है.
दो दिन से नही पुछा मां की तबीयत का हाल,
Girl Friend से पल-पल की खबर पायी है,
जिन्दगी ये किस मोड पे ले आयी है…..

कभी खुली हवा मे घुमते थे,
अब AC की आदत लगायी है.
धुप हमसे सहन नही होती,
हर कोई देता यही दुहाई है.

मेहनत के काम हम करते नही,
इसीलिये Gym जाने की नौबत आयी है.
McDonalds, PizaaHut जाने लगे,
दाल-रोटी तो मुश्कील से खायी है.
जिन्दगी ये किस मोड पे ले आयी है…..

Work Relation हमने बडाये,
पर दोस्तो की संख्या घटायी है.
Professional ने की है तरक्की,
Social ने मुंह की खायी है.
जिन्दगी ये किस मोड पे ले आयी है

Tuesday, May 5, 2009

ज़िंदगी है छोटी, हर पल में ख़ुश रहो

ज़िंदगी है छोटी, हर पल में ख़ुश रहो...

Office मे ख़ुश रहो, घर में ख़ुश रहो...

आज पनीर नही है दाल में ही ख़ुश रहो...

आज gym जाने का समय नही, दो क़दम चल के ही ख़ुश रहो...

आज दोस्तो का साथ नही, TV देख के ही ख़ुश रहो...

घर जा नही सकते तो फ़ोन कर के ही ख़ुश रहो...

आज कोई नाराज़ है उसके इस अंदाज़ में भी ख़ुश रहो...

जिसे देख नही सकते उसकी आवाज़ में ही ख़ुश रहो...

जिसे पा नही सकते उसकी याद में ही ख़ुश रहो

Laptop ना मिला तो क्या, Desktop में ही ख़ुश रहो...

बीता हुआ कल जा चुका है उसकी मीठी यादें है उनमे ही ख़ुश रहो...

आने वाले पल का पता नही... सपनो में ही ख़ुश रहो...

हसते हसते ये पल बिताएँगे, आज में ही ख़ुश रहो

ज़िंदगी है छोटी, हर पल में ख़ुश रहो

Sunday, May 3, 2009

हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती।

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती।

नन्ही चींटी जब दाना ले के चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है,
मन का विश्वास रगों में साह्स भरता है,
चढ़ कर गिरना, गिर कर चढना, न अखरता है,
आख़िर उसकी महनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

डुबकियां सिन्धु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर, खाली हाथ लौट आता है,
मिलते न सहज ही मोती पानी में,
बहता दूना उत्साह हैरानी में,
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो,
जब तक न सफल हो, नींद चैन की त्यागो तुम,
संघर्षों का मैदान, छोड़ मत भागो तुम,
कुछ किए बिना ही जय जय कार नहीं होती,
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती।

Saturday, May 2, 2009

काँच की बरनी और दो कप चाय - एक बोध कथा

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है, सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा , "काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है ।दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं...उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ... आवाज आई...फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये, धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये, फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा..सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी रेत के बीच में स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई...प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया - इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो... टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं, छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं, और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ है..अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है...यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ...

Friday, May 1, 2009

दोस्ती की अहमियत

दोस्ती दुनिया की वो ख़ुशी है,
जिसकी ज़रूरत हर किसी को हुई है,
गुजार के देखो कभी अकेले ज़िन्दगी,
फिर खुद जान जाओगे के दोस्ती के बिना ज़िन्दगी भी अधूरी है.

कीसी का दिल तूदना हमारी आदत नहीं
कीसी का दिल दुखाना हमारी फिरात नहीं
भरोसा रखना हम पर तुम
दोस्त कह कर कीसी को यूह,हम बदलते नहीं

हर कुशी दिल के करीब नहीं होती,
ज़िन्दगी घुमो से दूर नहीं होती,
आये दोस्त मेरी दोस्ती को संभल कर रक,
हमारी दोस्ती हर किसी को नसीब नहीं होती...

तेरी दोस्ती हम इस तरह निधायेंगे तुम रोज़ खफा होना
हम रोज़ मनायेंगे पर मान जाना मनाने से
वरना यह भीगी पलकें ले के कहा जायेंगे..

इतना प्यार पाया है आप से...
उस से ज्यादा पाने को जी चाहता है...
नजाने वो कौन सी खोबी है आप में.
की अप से दोस्ती निभाने को जी चाहता है...